की
अब
खुद
को
नही
पहचान
पाता
हूँ
मैं
जिस
दुनिया
के
लिए
जीता
था
हर
कदम
पे
आज
उसी
से
नज़रें चुराता हूँ मैं
तन्हाई
चारों
और
से
यूं
घेरे
है
मुझे
की
भीड़
में
भी
अब
घबराता
हूँ
मैं
इस
क़दर
यूं
तनहा
मोड़
पर
मेरा
हाथ
छोड़
के
चल
दिए
इक
पुकार
भी
नही
लगा
पाता
हूँ
मैं
किस
किस
से
कहूं
क्या
हुआ
है
मुझे
खुद
को
ही
नही
समझा
पाता
हूँ
मैं
अब बस
उस
दिन
का
इंतज़ार
है
मुझे...
जब
यह
सांसें
थमेंगी
, उस
खुदा
की
अदालत
में
इन्साफ
होगा
उस सवाल
का
जवाब
दूंगा
तब
, जो
आज नही
दे
पाता
हूँ
मैं...
